ऑनलाइन शिक्षा 5:नेपथ्य के प्रश्न, पक्ष-प्रतिपक्ष,विसंगतियां


 


रिपोर्ट-आनंद सिंह 'मनभावन'
गोरखपुर।
विकल्प को संकल्प बनाने वाली पद्धति की इस कड़ी को हम अदृश्य दावों और मूर्छित वादों की तुला पर देखने का प्रयास करेंगे।विश्लेषणके इस भाग में हम अभिभावक, अध्यापक,प्रबंधन,और विद्यार्थियों रूपी चारों खम्भों पर टिकी विद्यालयों की शिक्षा,नैतिकता,और संस्कार के मिश्रण से बनी छत की मजबूती परखने और उनके दुर्बल पक्ष को जानने का प्रयास करेंगे।
आइए अभिभावकों के पक्ष से प्रारंभ करते हैं।विभिन्न विद्यालयों में अपने पाल्यों को पढ़ा रहे तमाम अभिभावकों से बात करने पर जो प्रश्न सामने आए हैं,उनमें सबसे प्रमुख प्रश्नों में एक प्रश्न ये है कि इन्फेंट,प्राइमरी,सब जूनियर,और जूनियर कक्षाओं के पाल्यों के 'गार्जियन' ने इस व्यवस्था को पूरी तरह नकारते हुए इसे महज़ 'फीस वसूलने के तरीके' के रूप में परिभाषित किया।उनका कहना है कि ऑफ़लाइन अथवा क्लासरूम अध्ययन में जो बच्चा छः घंटे पढ़ता है, फिर दो घंटे ट्यूशन पढ़ने के पश्चात भी पूरी तरह से पाठ्यक्रम,अथवा विषय नहीं समझ पाता,उसे इस ऑनलाइन क्लास से क्या फायदा होगा?यह महज विद्यालयों द्वारा फीस वसूली के लिए दबाव बनाने का 'अघोषित-अदृश्य माध्यम' है।दूसरे,ज्यादातर अभिभावकों का कहना है कि आंखों के डॉक्टर की सलाह होती है कि लगातार आधे घंटे तक टीवी तक नहीं देखना चाहिए क्योंकि इससे आंखों पर जोर पड़ता है और मासूमों की आंखों को खराब होने का खतरा बढ़ जाता है,जबकि टीवी की स्क्रीन अपेक्षाकृत बड़ी  भी होती है,ऐसे में छः से आठ इंच वाली मोबाइल स्क्रीन पर लगातार तीन घण्टे की क्लास चलाते रहना कहाँ तक सही है?तीसरी शिकायत है कि किसी भी ऑनलाइन क्लॉस में सारे  बच्चों के सवाल नहीं लिए जा रहे,जबकि होना ये चाहिए कि सभी  विद्यार्थियों की जिज्ञासा का समाधान किया जाय।मगर ज्यादातर विद्यालयों की व्यवस्था कक्षाओं के दौरान 'वन वे कम्युनिकेशन' की होती है।यद्यपि कुछ विशेष एप्पलीकेशन से चलने वाली कक्षाओं में ये व्यवस्थाएं हैं कि, उसमें प्रश्नकर्ता को 'अनम्यूट' करके प्रश्न लिए जाते हैं परन्तु छोटी कक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए ये पूरी तरह अव्यवहारिक, अर्थहीन और अप्रासंगिक है,और किसी भी तरह  के छोटे विद्यार्थियों को इससे बहुत निराशा हो रही है।अभिभावकों की बहुत प्रासंगिक समस्या ये भी है कि एक ही घर मे विभिन्न कक्षाओं के तीन विद्यार्थियों के होने पर उनकी कक्षाएं नहीं हो पा रही हैं क्योंकि घर मे मोबाइल एक है और समय सारणी भी 'क्लैश' कर रही है।इसके अतिरिक्त ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान मोबाइल 'हीट' हो रहा है,जिससे दुर्घटनाओं का डर है,और इसके साथ ही 'विकिरण' का भी डर है जिससे बच्चों को खतरा हो सकता है।सारे अभिभावक इतने सक्षम नहीं कि हर विद्यार्थी के लिए अलग मोबाइल,लैपटॉप,अथवा टेबलेट रखें और उनको डेटा के लिए रिचार्ज भी करवाते रहें,क्योंकि उनको घर की अन्य आवश्यकताओं के लिए भी अपने बजट रखने होते हैं।इन सबके अतिरिक्त वो अभिभावक जो विभिन्न संगठित-असंगठित क्षेत्रों में कार्यरत हैं उनके अपने कार्य मोबाइल व्यस्त होने की दशा में प्रभावित हो रहे है जिससे वो तमाम मानसिक दबाव महसूस कर रहे हैं।कुल मिलाकर अभिभावकों और खासकर व्यापारी और नौकरीपेशा अभिभावक अपने ऊपर तमाम आर्थिक,मानसिक,और सामाजिक दबाव महसूस कर रहे हैं।
विद्यार्थियों की समस्या पर बात करें तो उनके अनुसार उनको इस पद्धति में कुछ भी 'पल्ले' नहीं पड़ रहा। वो महज़  दोतरफा 'दबाव' की वजह से कक्षाओं में शामिल हो रहे हैं।उनका कहना है कि घर पर विद्यालयों जैसा माहौल नहीं होता,वैसे भी छोटे विद्यार्थियों को कुछ भी समझने और समझाने के लिए एकाग्रता,अनुशासन, और परस्पर अंतर्क्रिया की आवश्यकता है, जो ऑनलाइन कक्षाओं में कभी संभव नहीं।इसके अतिरिक्त तकनीकी व्यवधान की वजह से भी विद्यार्थियो का तारतम्य भी बन नहीं पाता और वो बेहद दबाव और दुविधाग्रस्त स्थिति में स्वयं को महसूस कर रहे हैं।कभी उनको अध्यापक की कही बात नहीं समझ मे आती,कभी वो अपनी समस्या अपने अध्यापकों तक सही ढंग से नहीं पहुँचा पा रहे,और इस तरह से यह पद्धति अव्यवस्थाओं,संशयों,और दबावों से बनी 'खिचड़ी' के अतिरिक्त और कुछ नहीं साबित हो रही,जिसे प्रायः 'बीमारी' के समय जिंदा रहने के लिए 'रोगी' को पथ्य के रूप में देते हैं।अंतर महज इतना है कि उत्तम स्वास्थ्य हेतु पथ्य के रूप में दी जाने वाली खिचड़ी को 'सुपाच्य' मानकर दिया जाता है।जबकि यहाँ इसे 'पचा पाना' एक 'टेढ़ी खीर' साबित हो रहा।
प्रबंधन को बस 'नाम' और 'अर्थ' से सरोकार है।वो 'क्वालिटी' भी 'क्वांटिटी' के हिसाब से बढ़ाता है।उसे संस्था और विद्यार्थियों दोनों की ' संख्या में इजाफा चाहिए।इसलिए उसके लिए 'अभिभावक' और 'विद्यार्थियों' में किसी प्रकार की कोई गलती अथवा त्रुटि नज़र नही आती।वो तो बस हर गलती के लिए एक ही को ज़िम्मेदार मानता है,वो है अध्यापक।बल्कि यूं कहें कि उसने अध्यापकों को नियुक्ति ही इसीलिए की है कि उसे सारी गलतियों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सके।उनके अनुसार वो अपना 'बेस्ट' देने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ते।
अब ज़रा अध्यापको के पहलुओं को भी देखने समझने का प्रयास करते हैं।अध्यापक इस 'तीन तरफा' दबाव की वजह से सबसे अधिक तनाव में है। एक तरफ प्रबंधन का दबाव है जो पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए 'किसी भी तरह' ऑनलाइन कक्षा के लिए तैयार होने पर बाध्य करता है।दूसरा उनका नैतिक दायित्व उन्हें मजबूर करता है कि वो सग्राह्य और सरल तरीके से विद्यार्थियों के समझने हेतु पाठ्य सामग्री और पाठ्ययोजना तैयार कर के प्रस्तुत करें, जिससे प्रत्येक विद्यार्थियों को उनके द्वारा पढ़ाई गई चीज़ें समझ मे आएं।जिसके लिए उन्हें विभिन्न उदाहरणों,एवम दृष्टांतो की मदद लेनी पड़ती है जो वास्तव में उस किताब में नही होते लेकिन उससे संबंधित अवश्य होते हैं जिससे  उनके सारे विद्यार्थियों की समझ मे वो बातें आएं इसलिए उन्हें इस युक्ति का सहारा लेना पड़ता है और इसी में उनको अभिभावकों, और प्रबंधन का दोहरा दबाव झेलना पड़ रहा है।छोटे विद्यार्थी अपनी पुस्तको के अतिरिक्त कुछ और देख नही पाते और समझना भी नही चाहते, इसलिए वो कठिनाई महसूस करते हैं।अभिभावक बस इसी का फायदा उठाते हुए अध्यापको की शिकायत प्रबंधन से करते हैं,साथ ही अध्यापक से भी बहुत अभद्रता से बात करते हैं,और जैसा कि सभी विद्यालयों के प्रबंधन का उसूल हैं कि वो अभिभावकों एवम विद्यार्थियों को कभी गलत नहीं ठहराते इसलिए वो इसका सारा ठीकरा बेचारे अध्यापकों पर फोड़कर उन्हें अकुशल,और बेकार साबित करते हैं और उनको सेवामुक्त करने की धमकी देते हैं या फिर उनके सर पर सेवामुक्ति,अथवा वेतन कटौती की तलवार लटका देते हैं।इन सबसे द्वंद्व करता हुआ अध्यापक बार बार खुद को उन दोहों में तलाश करता हैं जिनमे उनको ईश्वर से भी ऊंचा स्थान देते हुए कहा गया है कि...
'गुरु गाविंद दोउ खड़े,काके लागों पांय
बलिहारी गुरु आपने,गोविंद दियो बताय।
उसको अपने अस्तित्व के साथ ही अब 'गोविंद' के भी चेहरे धुंधले नज़र आने लगते हैं।उनकी सबसे बड़ी पीड़ा ये है कि उनके श्रम,धैर्य,विद्वता,और अनुशासन किसी चीज़ को किसी के भी द्वारा महत्व नहीं दिया जा रहा। प्रबंधन उन्हें अपना सहयोगी नहीं 'गुलाम' अथवा 'बंधक' मानता है,अभिभावक उन्हें अपने फीस की 'कीमत', और विद्यार्थी उन्हें महज 'सहायक'।इन्ही तीनों के बीच मे अध्यापक अपने आत्मसम्मान,प्रतिष्ठा, ज्ञान,और मूल्यों के चार झरोंखों के पीछे अपने अदृश्य-आत्मकेंद्रित स्वाभिमान को ओढ़े,किंकर्तव्यविमूढ़ अपनी नियति को 'वेतन और कृपा' के दो पाटों के बीच पिसता देख रहा है खामोशी से......।
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